कहां चले गए हैं सारे कवि?

समय के चौराहे पर खड़ी सभ्यताद्वेष की राह को निहार रही है।ये कौन बताएगा हमेंकि उस पथ का शेष केवल शेष है? अंतर्भास अन्तर के आभास से आएगा,ये कौन समझाएगा इस पीढ़ी कोअपने सशक्त, कोमल, तीक्ष्ण, प्रेरक, स्नेहीपंक्तियों से? कहां चले गए हैं सारे कवि? जब देशभक्ति का अमृत लोगों के रगों मेंराष्ट्रवाद के विषContinue reading “कहां चले गए हैं सारे कवि?”

मैं विकास हूं

मैं विकास हूं। मैं खो गया हूं।बैठकर मेरे कांधों पर पुत्र लाया था मुझे।धर्म और राजनीति के संगम परस्नान कराया था मुझे।फिर महत्वाकांक्षा के कुंभ मेंछोड़ आया था मुझे। मैं विकास हूं। मैं खो गया हूं।थी प्रीत जहां की रीत सदाये वो लुप्त उपवन हैआज यहां भ्रमण करतेरक्त के प्यासे जन हैंनफ़रत की आग मेंContinue reading “मैं विकास हूं”

दिल्ली किसकी है?

दिल्ली किसकी है?किसीकी नहीं…इसे अपना बनाना पड़ता है —कुछ ज़ोर-ज़बरदस्ती से,कुछ चपेट खाते हुए |दिल्ली उसकी है जिसने नदी के बहाव कोमोड़कर तैरना सीखा;जिसने मुस्कुराते हुएटूटे शीशे पे चलना सीखा;जिस ने सीखा की मेरी पहचानएक शहर, एक पिन कोड से नहीं है;मेरी पहचान मेरी सोच, मेरी ताकत से है|मेरे लिए पूरी दुनिया दिल्ली है|